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टाटा ग्रुप को एयर इंडिया बेचने की तैयारी में है सरकार।

            Read this article in English:- Government may sell Air India to Tata Group.

      बहुत समय से यह सुनने को मिल रहा था कि भारत सरकार एयर इंडिया में विनिवेश की योजना बना रही है। इसी के तहत 14 दिसंबर 2020 तक उन सभी कंपनियों को अपना दावा ठोकना था, जो एयर इंडिया को खरीदने की इच्छा रखती हैं। इसके बाद से ही खबर आनी शुरू हो गई कि टाटा ग्रुप ने भी इसे खरीदने की इच्छा जताई है। इस बात की संभावना किसी ने नहीं जताई थी, क्योंकि एयर इंडिया को सबसे पहले शुरू करने वाली कंपनी टाटा ही थी, जिसे बाद में भूतपूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सरकारी कंपनी बना दिया था। अब ऐसा हो सकता है कि एयर इंडिया वापस टाटा ग्रुप के पास चली जाए।

      तिथी समाप्त होने तक भारत सरकार को बहुत सारे आवेदन मिले थे, जिनमें विभिन्न कंपनियों ने एयर इंडिया को खरीदने की इच्छा जताई है। इन आवेदनों में सबसे ऊपर नाम टाटा सन्स का है। इसके अलावा एयर इंडिया के ही कुछ कर्मचारियों ने मिलकर अमरीका की एक निवेश करने वाली कंपनी के साथ आवेदन किया है। यह इच्छा की अभिव्यक्ति” (Expression of Interest) 14 दिसंबर की शाम 5 बजे तक था। अब सरकार 05 जनवरी 2021 तक यह सूचित करेगी कि किस – किस कंपनी ने इसे खरीदने के लिए अर्हता किया है।

      पहले भी की थी बेचने की कोशिश।

      ऐसा पहली बार नहीं है कि एयर इंडिया का विनिवेश किया जा रहा है। इससे पहले 2018 में भी सरकार की यही कोशिश थी। लेकिन उस समय यह कोशिश बुरी तरह विफल रही थी, क्योंकि सरकार को कोई भी ऐसा आवेदन नहीं मिला, जो इसे खरीदने की इच्छा रखता हो। इस विफलता के पीछे भी कई सारे कारण थे। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि सरकार इसका 76 प्रतिशत हिस्सा ही बेचना चाहती थी और 24 प्रतिशत हिस्से को अपने पास रखना चाहती थी। इसके अलावा एयर इंडिया पर बहुत सारा कर्ज भी था, जोकि निवेशकों को ही चुकाना था।

      विफलता के कारण।

      इस विफलता के बाद सरकार ने Ernst & Young (EY) कंपनी को एक रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा गया, जिसने इसके निम्नलिखित कारण खोजे:-

  1. सरकार का 24 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदार रखना। कंपनियों का मानना था कि सरकारी की इतनी बड़ी हिस्सेदारी से सभी को डर था कि एयर इंडिया के कामकाज में सरकार दखल देगी।
  2. कच्चे तेल की कीमतों में लगातार परिवर्तन होना।
  3. विनमय दर में उतार चढ़ाव होना।
  4. एयर इंडिया पर भारी कर्ज।
  5. एयरलाईन के व्यापार में मुनाफा न होने की आशंका।
  6. सरकार द्वारा बोली लगाने वाली कंपनियों पर कई तरह के प्रतिबंध लगाना।

      उपरोक्त वर्णित कारणों को देखने के पश्चात सरकार ने एयर इंडिया के विनिवेश प्रक्रिया को फिर से शुरू किया और इसमें कई बदलाव भी किए गए। इसमें सबसे बड़ा बदलाव है कि जो बोली लगेगी वह पूरे 100 प्रतिशत शेयर के लिए होगी। जिसका अर्थ हुआ कि सरकार कोई भी हिस्सा अपने पास नहीं रखेगी। इसके साथ ही एयर इंडिया की दूसरी कंपनी एयर इंडिया एक्सप्रेस, इसे भी 100 प्रतिशत शेयरों के साथ बेच दिया जाएगा। इसके अलावा इयर इंडिया का 50 प्रतिशत हिस्सा सिंगापुर की टर्मिनल सेवाओं में है, उसे भी बेच दिया जाएगा।

      कर्ज को कम किया गया।

      इन सबके अलावा दो साल पहले एयर इंडिया पर कर्ज करीब 60 हजार करोड़ रुपये था। दो साल के भीतर ही सरकार ने इस कर्ज का बहुत बड़ा हिस्सा चुका कर 23 हजार करोड़ रुपये पर ला दिया है। यानि जो इसे खरीदेगा उसे अब 60 हजार करोड़ रुपये की जगह 23 हजार करोड़ का ही भुगतान करना होगा।

      यह जानकारी हालांकि सरकार द्वारा आधिकारिक तौर पर नहीं दी गई है, लेकिन विभन्न सूत्रों के अनुसार टाटा ग्रुप इसमें सबसे बड़ा नाम है। टाटा ग्रुप पहले से ही विस्तारा और एयर एशिया इंडिया के साथ एयरलाईन व्यापार में है, लेकिन टाटा ने इनके माध्यम से नहीं, बल्कि स्वतंत्र रूप से आवेदन किया है।

      टाटा और एयर इंडिया की पुरानी गाथा।

      टाटा सन्स ने टाटा एयरलाईन्स को 1932 में शुरू किया था, जिसका 1946 में नाम बदलकर एयर इंडिया रख दिया गया। इसे 1953 में भारत सरकार खरीद लेती है। हालांकि जे.आर.डी. टाटा को 1977 तक इसका चेयरमैन बनाया रखा जाता है। इसके बाद 1995 में टाटा ग्रुप फिर से एयरलाईन व्यापार में आने की इच्छा जताती है, लेकिन दिवंगत प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नर्सिंहा राव की कांग्रेस सरकार ने इसकी स्वीकृति प्रदान नहीं दी। 2001 में भी टाटा ग्रुप ने एयर इंडिया को खरीदने की कोशिश की थी, किंतु उस समय सरकार इसे बेचने के मूड में बिलकुल नहीं थी। आखिरकार 2013 में जाकर टाटा ग्रुप विस्तारा और एयर एशिया इंडिया में हिस्सेदारी खरीदती है और उनका एयरलाईन व्यापार में आने का सपना पूरा होता है।

      एयर इंडिया के कर्मचारी भी चाहते ही इसे खरीदना।

      यह भी गौरतलब है कि एयर इंडिया को खरीदने की दूसरी इच्छा स्वयं एयर इंडिया के कर्मचारियों ने अमरीका की एक कंपनी के साथ मिलकर की है। यह करीब 219 कर्मचारी हैं जो अमरीका की निवेश कंपनी Interups Inc. के साथ मिलकर एयर इंडिया में हिस्सेदारी खरीदेंगे। इस विनिवेश में सरकार ने यह भी छूट रखी है कि यदि कोई विदेशी कंपनी इसे खरीदना चाहती है तो वे अधिकतम 49 प्रतिशत शेयर खरीद सकती हैं। इस प्रकार कर्मचारियों का समूह बाकि का 51 प्रतिशत शेयर खरीदेगा।

      सरकार द्वारा यह सूचित किया गया कि 29 दिसंबर तक सभी कंपनियों द्वारा यह बोली लगाई जाएगी और 05 जनवरी 2021 तक उपयुक्त खरीदारों की सूची को सरकार जारी कर देगी। इसके बाद आखिर में वित्तीय बोली लगाई जाएगी और जिसकी बोली सबसे अधिक होगी, उसे ही यह एयर इंडिया का खरीदार माना जाएगा।

      एयर इंडिया को बचाने की कोशिशें हुई नाकाम।

      ऐसा नहीं है कि सरकार ने एयर इंडिया को बचाने की कोशिशें नहीं की। कई सालों से सरकार हर साल कई हज़ार करोड़ रुपये इसमें निवेश के रूप में डालती थी, लेकिन इसे बचाने की सभी कोशिशें नाकाम साबित हुईं। 2011-12 से हर साल सरकारी खजाने से निम्नलिखित रुपये एयर इंडिया में डाले गए:-

                                                                                                                                        (मूल्य करोड़ रुपये)

2011-12

1200

2012-13

6000

2013-14

6000

2014-15

5780

2015-16

3300

2016-17

2465.21

2017-18

1800

कुल

26,545.21

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