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जो बाएडन के आने से होगी भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत।

            Read this article in English:- There will be a boost in Indian economy under Joe Biden’s Presidency.

      नवंबर, 2020 में अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव में उम्मीदवार जो बाएडन के बाजी मारने के बाद से यह अटकलें बढ़ गई थी कि बाएडन का जीतना भारत के लिए अच्छा नहीं होगा। इसका कारण था कि बाएडन डोनाल्ड ट्रंप की तरह चीन पर सख्त रुख नहीं रखते हैं। वे अमरीका – चीन के ट्रेड वार भी खत्म करना चाहते हैं और चीन पर सैन्य सख्ती को भी थोड़ा नरम करेंगे।

      क्या हैं सवाल?

      फिर सवाल उठता है कि बाएडन के कार्यकाल में ऐसा क्या हो सकने की अटकलें हैं, जिससे वे भारत के लिए ट्रंप से अधिक उपयोगी साबित होंगे। कुछ लोगों का यह सवाल भी है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्रंप प्रशासन का अधिक समर्थन करते हैं क्योंकि पिछले एक साल में मोदी ने ट्रंप के समर्थन में हाउडी मोदी आयोजन में भाग लिया था और उसी तरह ट्रंप ने भारत में नमस्ते ट्रंप आयोजन में।

      देशहित सर्वोपरि।

      सबसे पहले दूसरे प्रशन का उत्तर ढूंढते हैं। तो बात यह है कि मोदी ने ट्रंप के समर्थन में रैली इसीलिए की थी क्योंकि उस समय ट्रंप अमरीका के राष्ट्रपति थे। यदि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी न होकर मनमोहन सिंह भी होते, तब भी यही कुछ होता। दो देशों के राष्ट्रध्यक्षों के रिश्ते निजी नहीं होते बल्कि उनके देशों के हितों को ध्यान में रख कर बनाए जाते हैं। जब बाएडन के जीतते ही मोदी ने उनके जीतने पर बधाई दी और उनके कार्यकाल में दोनों देशों के अच्छे रिश्तों की आशा जताई।

      चीन - पाकिस्तान से बढ़कर भी हैं दुश्मन।

      अब पहले सवाल पर आते हैं। दरअसल केवल चीन - पाकिस्तान ही भारत का दुश्मन नहीं है। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था आदि ज्यादा बड़े दुश्मन हैं। यदि हम भारत में इन मुसीबतों का हल निकालते हैं तो चीन से लड़ने की क्षमता हमारे अंदर स्वयं बढ़ जाएगी और हमें अमरीका से सहायता की आशा रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

      वैक्सीन के बिना नहीं चलेगी दुनिया की अर्थव्यवस्था।

      वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के मुकाबले भारतीय अर्थव्यवस्था ने दूसरी व तीसरी तिमाही में तेजी पकड़ी है। लोग अब काम पर लौट रहे हैं, यातायात चल रहा है, बाज़ारों में भीड़ जुट रही हैं। लेकिन जब तक कोरोना की कोई स्थाई वैक्सीन नहीं आ जाती, तब तक अर्थव्यवस्था का चक्का पूरी तेजी से नहीं चल पाएगा। इसी कड़ी में अब कई देशों से खुशखबरी आने लगी है कि जल्दी ही वैक्सीन को आम लोगों को दिया जाने लगेगा।

      अगले कुछ महीनों में जैसे – जैसे लोगों को कोरोना की वैक्सीन मिलने लगेगी, वैसे – वैसे उनके देशों में अर्थव्यवस्था दृढ़ संकल्प के साथ उठती चली जाएगी। बाजारों में मांग बढ़ेगी, फैक्ट्रियाँ फिर से ओवर टाईम पर चलेंगी और उनको चलाने के लिए ईधन की जरूरत पड़ेगी। अब ऐसे समय में भारत ने कम आयात करके व् सस्ते दामों पर कच्चा तेल खरीद कर लॉकडाउन के समय जो विदेशी मुद्रा भंडार जमा किए थे, उन्हें अधिक मात्रा में खर्चना पड़ेगा। क्योंकि काम बढ़ने के कारण तेल की मांग भी बढ़ेगी और मांग के साथ तेल की कीमतें भी, जिसे खरीदने के लिए ही विदेशी मुद्रा भंडार की जरूरत पड़ेगी।

      गौरतलब है कि लॉकडाउन में कच्चे तेल की कीमत 30-35 डॉलर प्रति बैरल पर रही, जिसे खरीद कर भारत ने 5000 करोड़ रुपये की बचत भी की थी। अब आगे जाकर तेल के दाम 80 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक हो सकती है।

      ईरान और वेनेजुएला हो सकते हैं भारत के लिए नए तेल निर्यातक।

      बाएडन के अंतर्गत अमरीकी प्रशासन बेशक चीन पर कड़ा रुख न रखे, लेकिन ईरान और वेनेजुएला जैसे देशों पर प्रतिबंधों में भारी कमी देखने को मिल सकती है। इसी कारण से भारत इन दोनों देशों से भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीद पाएगा और अपनी फैक्ट्रियों को सस्ते ईधन पर दौड़ा पाएगा।

      हालिया दिनों में भारत के पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने यह खुलकर कहा था कि हम जल्दी ही ईरान और वेनेजुएला दोनों ही देशों से तेल खरीदने वाले हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये दोनों ही देश भारत को बहुत ही कम दामों में तेल बेचते हैं और भारत अकेला ऐसा देश है जो अपनी जीडीपी का 4 प्रतिशत ईधन को खरीदने में लगाता है, जोकि बाकि देशों के मुकाबले बहुत बड़ा अंतर बन जाता है।

      यदि ऐसा होता है तो भारत बहुत बड़ी धन राशि को बचा लेगा और सामानों के परिवहन में कम खर्चा आने से सामानों की कीमत में भी कमी आएगी। इसके अलावा ईरान भारत को तेल को भारत तक भेजने और टैंकरों का खर्चा भी देने को तैयार है। साथ ही ईरान भारत को तेल का तुरंत भुगतान करने के बजाए बाद में भुगतान करने की सहुलियत भी देता है।

      चाहबहार बंदरगाह की भूमिका भी रहेगी महत्वपूर्ण।

      इसके अलावा यदि भारत ईरान के व्यापारिक संबंध अच्छे होते हैं तो भारत ईरान में चाहबहार बंदरगाह पर काम की शुरूआत भी कर सकता है। इसी बंदरगाह से भारत अपने व्यापार को मध्य ऐशिया तक पहुँचाने की चाह रखता है। इससे ईरान और चीन के बढ़ते रिश्तों में दरार भी डाली जा सकेगी क्योंकि यदि हम भारी मात्रा में ईरान से तेल खरीदेंगे तो हम यह भी सुनिश्चित करेंगे कि चीन जैसे देश ईरान को भारत के खिलाफ न करें।

      इसके अलावा ट्रंप प्रशासन के साथ भारत के किसी भी प्रकार के व्यापारिक समझौते नहीं हुए थे। बाएडन के साथ यह उम्मीद है कि दोनों देश अपने व्यापार को नई ऊंचाईयों तक ले जाएंगे। इसके साथ ही बाएडन का तुर्की पर भी भारी दबाव है और वे तुर्क राष्ट्रपति रजब तैयब अर्दोगान की नीतियों को बिल्कुल ही नापसंद करते हैं। इससे तुर्की भारत पर जो वैश्विक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है, उसमें भारी कमी देखने को मिल सकती है। रूस पर भी बाएडन का रवैया काफी सख्त है, जो चीन और रूस के बढ़ते गठजोड़ में ढीलाई ला सकता है।

      फिर भी भारत की घरेलू नीतियों पर अमरीका का रहेगा दबाव।

      लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि बाएडन की नीतियाँ भारत के लिए पूरी तरह नरम हो जाएगी। इसकी पूरी संभावना जताई जा रही है कि धारा 370 हटाने का मसला, नए नागरिकता कानून और कई धार्मिक मुददों पर अमरीका की ओर से भारत की आलोचना होगी, जैसा कि हमें डॉनाल्ड ट्रंप के समय में देखने को नहीं मिलता था।

      लेकिन ऐसा नहीं है कि इससे भारत की घरेलू नीतियाँ बदलेंगी। बेशक इससे भारत सरकार वैश्विक दबाव में होगी और देखना यह होगा कि गृह मंत्री अमित शाह नागरिकता का राष्ट्रीय रजिस्टर जैसे महत्वकांशी बिल को इस दबाव में कैसे पास करवाते हैं।

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