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वियतनाम के मजबूत रिश्ते- मोदी सरकार ने आकाश मिसाइल के निर्यात को मंजूरी दी।

      भारत की आकाश मिसाइल सुर्खियाँ में हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार ने मित्र राष्ट्रों को स्वदेशी रूप से विकसित आकाश मिसाइल सिस्टम के निर्यात को मंजूरी दे दी है, ताकि वह अपनी आत्मनिर्भर भारत पॉलिसी को आगे बढ़ा सके।

      रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को घोषणा की कि 96% स्वदेशी उपकरणों  के साथ शॉर्ट-रेंज, सतह से हवा में मार करने वाली आकाश मिसाइलों का निर्यातिक संस्करण, भारतीय सशस्त्र बलों के साथ सेवा में मौजूद आकाश मिसाइलों से अलग होगा।

      हाई वैल्यू वाले डिफेन्स प्लेटफार्मों के एक्सपोर्ट को ध्यान में रखते हुए, तेजी से मंजूरी के लिए एक कमिटी का गठन किया गया है क्योंकि भारत का लक्ष्य 5 अरब डॉलर के डिफेन्स एक्सपोर्ट को हासिल करना है और मित्र देशों के साथ रणनीतिक संबंधों में सुधार करना है।

      भारत लंबे समय से स्वदेशी मिसाइल सिस्टम को बेचने के लिए वियतनाम के साथ बातचीत कर रहा है। इस फैसले से वियतनाम को जल्द ही आकाश मिसाइल सिस्टम मिल सकता है।

      वियतनाम दक्षिण चीन सागर में चीन के तानाशाही रवैये से जूझ रहा है। इस इलाके में चीन अपने पड़ोसी वियतनाम समेत सभी 12 देशों के दावे को खारिज कर दक्षिण चीन सागर को चीन का हिस्सा बताता रहा है। इसी मसले ने भारत और वियतनाम को करीब ला दिया है।

      वियतनाम के प्रधानमंत्री गुयेन जुआन और भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी के बीच वर्चुअल शिखर सम्मेलन के एक हफ्ते बाद बुधवार को कैबिनेट ने आकाश मिसाइलों को एक्सपोर्ट करने काफैसला लिया है। इससे पहले भारत और वियतनाम दोनों ने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं और साथ ही सैन्य सहयोग को भी तेज करने का फैसला लिया है, जोकि चीन को परेशान करने के लिये काफी है। वहीं दूसरी तरफ भारतीय नौसेना ने वियतनाम की नौसेना के साथ दक्षिण चीन सागर में ‘पैसेज अभ्यास’ भी किया है जिसमें भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर ने भी हिस्सा लिया था, जिससे चीन के होश उड़ चुके हैं।

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      चीन के प्रति भारत का नजरिया लद्दाख घटना के बाद बदल गया है। बदली हुई रणनीति पर काम करते हुए भारत अब चीन के पड़ोसी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने में जुटा है। वहीँ भारत अपने इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन - आइटेक प्रोग्राम के तहत वियतनाम के सैन्य अधिकारियों को ट्रेनिंग भी दे रहा है। इसके तहत वहां के अधिकारी हर साल भारत में आते हैं। इसके बाद उन्हें आर्मी, एयरफोर्स और नेवी ऑपरेशन की ट्रेनिंग के साथ ही कमांडो कार्रवाई की ट्रेनिंग भी दी जाती है।

      भारत के डिफेन्स रिसर्च डेवलपमेंट ओरगनाईजेसन (DRDO) द्वारा डिजाइन और डेवेलप, 25 किमी की रेंज वाली आकाश मिसाइल सिस्टम फाइटर जेट्स, क्रूज मिसाइलों, ड्रोन और अन्य एरियल टारगेट्स को निशाना बना सकते हैं, जो वियतनाम की सुरक्षा को अभेद किले में तब्दील कर देंगे। जिससे निपट पाना चीन के बस की बात नहीं होगी।

      इस महीने की शुरुआत में भारतीय वायु सेना ने आंध्र प्रदेश में सूर्यलंका टेस्टिंग रेंज में देसी आकाश मिसाइलों के 10 टेस्ट फायर किये हैं। वहीं आकाश मिसाइल सिस्टम को वर्तमान में पूर्वी लद्दाख में चीन से लगी सीमा लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल के साथ तैनात किया गया है जहां भारतीय और चीनी सैनिक टकराव की स्थिति में हैं।

      इस मिसाइल को वर्तमान में सीकर टेक्नोलॉजी, रिड्यूस्ड फुटप्रिंट, 360 डिग्री घुमने की क्षमता यानि हर तरफ हमला करने की ताक़त, ज्यादा ऊचाई और कम तापमान वाले इलाकों में ऑपरेशन करने के लिये अपग्रेड किया जा रहा है। जो अपग्रेडेड आकाश मिसाइल सिस्टम को ज्यादा आसानी से और ज्यादा ऊंचाई वाले इलाकों में टारगेट को ढेर करने में सक्षम करेगा। बात साफ है कि भारत अब चीन को हिमालय से लेकर दक्षिण चीन सागर तक घेरने की तैयारी कर चुका है, वियतनाम के अलावा भी दक्षिण चीन सागर क्षेत्र के कई देश जैसे फ़िलीपीन्स, ताइवान, इंडोनेशिया चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के लिये भारतीय मिसाइलों में अपनी दिलचस्पी दिखा रहें हैं।

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      क्या नेपाल का चीन से हुआ मोहभंग? नेपाल को भी सताने लगी है भारत की याद।

      नेपाल में राजनीतिक उठा-पटक के बीच चीन ने उसके आंतरिक मामलों में सीधा दखल देना शुरू कर दिया है। नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने अचानक संसद को भंग कर दिया था, उसके बाद नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई है। नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी का बंटवारा चीन को नागवार गुजर रहा है।

      चीन कम्युनिस्ट पार्टी के अंतर्राष्ट्रीय विंग के उपमंत्री गुओ येजोऊ एक उच्चस्तरीय टीम के साथ नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुंच गए और दोनों खेमों से बातचीत में जुट गए हैं। नेपाल में आए सियासी भूचाल के बीच चीन के बढ़ते दखल ने स्थानीय लोगों को भड़का दिया है।

      चीन के प्रतिनिधिमंडल के पहुँचते ही लोग सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन करने लगे। चीन विरोधी नारे लगाए गए। चीन का यह प्रतिनिधिमंडल नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के बीच मतभेद दूर करने की कोशिश करेगा और जमीनी स्थिति का आकलन भी करेगा।

      नेपाल के लोगों ने चीनी दूतावास के बाहर वापस जाओ के नारे भी लगाए। लोगों को इस बात का अहसास हो चुका है कि चीन मदद के नाम पर नेपाल की जमीन कब्जा रहा है और के.पी. ओली ने चीन को खुली छूट दे रखी है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन पर नेपाल की जनता को कोई आश्चर्य नहीं हुआ।

      उसकी वजह सिर्फ यही नहीं है कि पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली और वरिष्ठ नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के गुटों का टकराव इस हद तक बढ़ गया था कि सबको इसका पहले से ही अंदाजा लग गया था। दरअसल इसकी वजह यह भी है कि जब 2018 में ओली और दहल गुटों का विलय हुआ था तब भी किसी को ये उम्मीद नहीं थी ​कि यह एकता ज्यादा दिन चलेगी। जब विलय हुआ था तब वह विचारधाराओं की एकता नहीं थी। पूर्व माओवादियों के भीतर अपनी समस्याएं थी।

      नेपाली कम्युनिस्टो को अभी भी यह अनुभव नहीं है कि सरकार कैसे चलाई जाती है। के.पी. शर्मा ने अपनी सत्ता बचाने के लिए नेपाल को चीन की गोद में डाल दिया और चीन का हस्तक्षेप बढ़ता ही गया। नेपाल में चीन की राजदूत होऊ यांकी ने दोनों पक्षों में तनाव को कम करने के लिए ओली और प्रचंड के बीच बातचीत कराई थी लेकिन ओली ने संसद भंग कर असंवैधानिक कदम उठा कर गलती कर दी। के.पी. शर्मा ओली का झुकाव चीन की तरफ है।

      चीन का प्रतिनिधिमंडल चार दिन तक काठमांडू में रहेगा। चीन ओली के लिये समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। वहीँ भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल में तेजी से घट रहे राजनीतिक घटनाक्रमों पर सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि यह पड़ौसी देश का अंदरूनी मामला है और इस बारे में उसी देश को अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के मुताबिक फैसला करना है लेकिन चीन सीधा हस्तक्षेप करने में लगा है।

      इस दखलंदाजी को लेकर नेपाल के भीतर ही सवाल उठने लगे हैं। कुछ समय से चीनी राजदूत होऊ यांकी की गतिविधियों पर कई क्षेत्रों में असहजता देखी जा रही थी। हालाकिं कई कम्युनिस्ट नेता चीन से अपना वैचारिक रिश्ता मानते हैं लेकिन एक संवैधानिक लोकतांत्रिक देश में बाहरी ताकत का इस तरह सीधे दखल देना असामान्य है।

      विपक्षी नेपाली कांग्रेस चीन के ऐसे दखल पर पहले से ही ऐतराज करती आ रही है, उसके नेता अब भी इस पर सवाल उठा रहे हैं।

      सवाल यह भी है कि चीन को नेपाल की इतनी चिंता क्यों है? वैश्विक शक्ति बनने की होड़ में लगे चीन का नेपाल की अर्थव्यवस्था पर पिछले कुछ वर्षों से कब्जा हो चुका है। यही वजह है कि नेपाल चीन की भाषा बोलता है। भारत के खिलाफ भी नेपाल चीन के सुर में सुर मिला रहा है।

      चीन ने नेपाल में काफी पैसा निवेश कर रखा है। ऐसा नहीं है कि भारत ने नेपाल को कोई कम धनराशि प्रदान की है। हर संकट के समय भारत ने उसकी भरपूर सहायता की है लेकिन नेपाल आज चीन का क्लाइंट स्टेट यानि ​आश्रित राज्य बन गया है। चीन ने नेपाल में बड़े प्रोजेक्ट पूरे किये हैं।

      नेपाल उसके बी. एंड आर. प्रोजैक्ट में भी शामिल है। चीन ने नेपाल में खास तौर पर ट्रांस हिमालय मल्टी डाइमेंशनल कनेक्टिविटी नेटवर्क के निर्माण पर कई अरब डॉलर इन्वेस्ट कर रखा है। वह हर तरह की सैन्य सहायता भी दे रहा है। चीन को यह चिंता सता रही है कि अगर नेपाल के मिडटर्म चुनाव में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में नहीं आई तो उसके अरमानों पर पानी फिर सकता है।

      अपनी नीतियों को लागू करने के लिए नेपाल में उनके रास्ते बंद हो सकते हैं। नेपाल में जिस तरह से राजशाही की वापसी की पुरजोर मांग उठ रही है, उससे भी चीन की नेपाल पर पकड़ ढीली हो सकती है। ऐसे में चीन को सियासी गतिरोध दूर करने के लिए आगे आना पड़ रहा है।

      चीन का प्रयास यह भी हो सकता है कि ओली को सत्ता से बेदखल कर पुष्प कमल दहल प्रचंड को कुर्सी सौंप दे। कभी प्रचंड को भारत समर्थक माना जाता था लेकिन चीन की भूमिका पर वह भी अब खामोशी धारण किये हुए हैं। देखना होगा कि राजनीतिक माहोल कैसा बनता है।

      अगर कम्युनिस्ट पार्टी दो फाड़ हो रही है तो विपक्षी नेपाली कांग्रेस को फायदा हो सकता है। नेपाल कांग्रेसी पार्टी भारत समर्थक मानी जाती है। भारत ने सदैव नेपाल को अपना मित्र देश माना है। ऐसे में नेपाल में चीन के दखल को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाना चाहिए क्योंकि चीन की नियत ठीक नहीं है।

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      चीन पर नकेल कसने के लिए अब भारत करेगा दक्षिण कोरिया से रक्षा समझौता।

      भारतीय सेना प्रमुख दक्षिण कोरिया की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं, जो पिछले दो महीनों में उनका पांचवां विदेशी दौरा है, जिससे पता चलता है कि भारत चीन से बढ़ते खतरे के बीच समान विचारधारा वाले देशों के साथ डिफेन्स सहयोग पर कितना जोर दे रहा है।

      जनरल एमएम नरवने ने सोमवार को दक्षिण कोरिया के नेशनल डिफेन्स मिनिस्टर सु वुक से मुलाकात की है,डिफेन्स कॉपरेशन के मुद्दों पर बातचीत की है। अपनी तीन दिवसीय यात्रा के दौरान, सेना प्रमुख भारत-कोरिया के डिफेन्स रिलेशन को बढ़ाने के लिए कोरिया के कई मिनिस्टर्स से मुलाकात करने वाले हैं।

      जनरल नरवणे ने गैंगवॉन में इनजे काउंटी में कोरिया कॉम्बेट ट्रेनिंग सेंटर और डेएजोन में डिफेन्स डेवेलपमेंट एजेंसी का दौरा भी किया। दोनों देशों के बीच डिफेन्स कोलैबोरेशन K9 वज्र-टी गन्स में देखा जा सकता है, जो भारत के लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और दक्षिण कोरिया के हनवा टेकविन (HTW) के बीच $720 मिलियन के डिफेन्स डील का परिणाम है।

      K-9 वज्र-टी, एक सेल्फ-प्रोपेल्ड होवित्जर है, जिसका वजन 50 टन है और यह 43 किमी दूर स्थित लक्ष्य पर 47 किलोग्राम के घातक हथियार को दाग सकता है। वहीं दूसरी अन्य कोरियन फर्म ‘मेक इन इंडिया’ कार्याक्रम के तहत भारतीय सेना के लिए माइंस-वीपर्स और ’बिहो’ के सेल्फ प्रोपेल्डएंटी एयर डिफेन्स सिस्टम के निर्माण के लिए एक प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं।

      भारत समान विचारधारा वाले देशों के साथ डिफेन्स डील्स को फ़ास्ट ट्रैककर रहा है जिसमे जिसमें सऊदी अरब, यूएई, इजराइल, नेपाल और मयंमार शामिल हैं, इन सभी देशों की यात्रा सेना प्रमुख हाल ही में करके लौटे हैं, वजह है चीन के साथ सीमा विवाद खत्म होता नज़र नहीं आ रहा। भारत और चीन की सेनाओं ने पहले से ही सीमा पर हैवी आर्टिलरी और अन्य मिलिट्री उपकरणों को तैनात कर दिया है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत चीन को हर तरफ से घेरने की तैयारी कर रहा है।

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