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खराब गुणवत्ता के बावजूद भारत क्यों खरीदता है मिग 29 लड़ाकू विमान?

            Read this article in English: Why India buys Mig 29 despite poor quality?

      गुरुवार 26 नवंबर 2020 की शाम को भारतीय नौसेना का एक मिग 29के (Mig29K) लड़ाकू विमान हादसे का शिकार हो गया था। इस हादसे में एक पायलट को तो बचा लिया गया है लेकिन 2 दिन की खोज के बावजूद दूसरा पायलट लापता है। यह हादसा अरब सागर में हुआ है, जिसमें लापता पायलट का नाम कमांडर निशांत सिंह है।

      यह विमान आई.एन.एस. विक्रमादित्य (INS Vikramaditya) से रवाना हुआ था और कमांडर निशांत सिंह उसमें एक ट्रेनर की भूमिका में थे। उनकी खोज अब भी जारी है, लेकिन उनसे संबंधित कुछ भी पता नहीं लगाया जा सका है।

      सीएजी (CAG) पहले भी उठा चुकी है सवाल।

      मिग 29 श्रृंखला का यह पहला विमान नहीं है जो इस तरह क्रैश हुआ है। इससे पहले भी कई बार ये विमान तकनीकी खामियों के कारण उड़ान भरने के बाद खराब हुए हैं और देश के कई पायलट इसका शिकार बने हैं। इससे पहले 2016 व 2018 में में सीएजी (CAG) ने भी इन विमानों की तकनीकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। लेकिन फिर भी भारत सरकार बार – बार मिग 29 विमानों को खरीद रही है। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि इस विमान के साथ बहुत अधिक समस्याए हैं। इसके इंजन से लेकर हर उस छोटी से छोटी चीज़ में समस्या है जोकि एक विमान को उड़ाने के लिए जरूरी होती है।

      उन्होंने आगे कहा था कि इतनी अधिक समस्याओं के बाद भी हम इन्हें बार – बार खरीद रहे हैं और रूस के साथ इनकी सर्विसिंग को लेकर भी मसला है, जोकि समय पर हमें मिल नहीं पाती है।

      फिर से खरीदे जाएंगे मिग 29।

      इससे पहले इसी साल जून 2020 में जब भारत का चीन के साथ टकराव चरम पर था तो मोदी सरकार ने यह घोषणा की थी कि हम रूस से 39000 करोड़ के सुखोई एवं मिग 29 विमान खरीदेंगे। सरकार का यह निर्णय काफी हैरान कर देने वाला था क्योंकि रूसी विमान खासकर मिग विमानों की क्षमता पर सवाल हमेशा से ही उठते रहे हैं।

      कितने मिग विमान और हैं भारत के पास।

      मिग श्रृंखला के कई विमान हमारे पास बहुत समय से हैं। जो मिग 21 (MIG 21) विमान 60 के दशक से भारत में हैं उन्हें उड़ते ताबूत (Flying Coffin) नाम से भी बुलाया जाता है क्योंकि हमारे बहुत से पायलट उसमें सवार होकर मृत्यु को प्राप्त हुए हैं। आज के समय के मिग 29 विमान 30 साल से भी अधिक समय से हमारी वायुसेना में कार्यरत हैं। फिलहाल वायुसेना में इनकी कुल संख्या 65 है और इसी तरह के 21 विमान और आयात होने वाले हैं। इसके अलावा नौसेना के लिए भी इसका एक रूप है जिसका नाम है मिग 29के, जिसकी कुल संख्या 36 है और इन्हें 2004 व् 2010 में मनमोहन सिंह सरकार के अधीन खरीदा गया था।

      क्रैश की कहानी है पुरानी।

      इसी साल की शुरूआत में भी एक मिग 29के विमान गोवा के पास क्रैश हुआ था, जिममें पायलट की जान बच गई थी। इससे थोड़ा पीछे जाएं तो 2019 के नंवबर महीने में भी एक मिग 29के विमान भी गोवा में क्रैश कर गया था। इस क्रैश का कारण दोनों इंजनों का खराब हो जाना था। यह सोचने वाली बात है कि दुनिया तकनीक के मामले में इतनी आगे बढ़ चुकी है लेकिन फिर भी एक लड़ाकू विमान के दोनों ही इंजन एक साथ उड़ान के समय खराब हो जाते हैं। इसी तरह से 2018 में भी ऐसा ही हादसा पेश आया था। जबसे ये सेना में कार्यरत हैं, तब से हर साल कोई न कोई विमान क्रैश हो रहा है और साथ ही हमें अपने पायलटों को खोना पड़ रहा है।

      इस गंभीर विषय को लेकर भारत में फिल्म भी बन चुकी है। आमिर खान की फिल्म रंग दे बसंती में भी मिग 21 विमानों के लगातार क्रैश होने का मुद्दा उठाया गया था।

      रूस में भी होते हैं ऐसे हादसे।

      ऐसा नहीं है कि रूस ने भारत को ही खराब विमान दिए हैं। वे खुद भी इसी तरह के हादसों का शिकार हो रहे हैं। सबसे बड़ी खामी इन विमानों में यह है कि इनका डिज़ाईन 80 के दशक का है, जो आजकल के अत्याधुनिक विमानों के सामने कहीं नहीं ठहरता है। लेकिन सवाल उठता है कि क्यों इतना सब होने के बावजूद हम इन्हें खरीद रहे हैं।

      क्यों भारत को खरीदने पड़ रहे हैं मिग विमान?

      इस सवाल का दुखद जवाब है इन विमानों की सस्ती कीमत। एक मिग जहाज को यदि बहुत से फीचर के साथ सुसज्जित भी कर लिया जाए तो भी यह एक राफेल लड़ाकू विमान (Rafale fighter jet) से 3 गुना सस्ता मिल जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं है कि सस्ता लेकर हम कोई बहुत ही फायदे का सौदा कर रहे हैं। इसके इंजन से लेकर हर पार्ट की उम्र राफेल से कम ही होगी और सर्विस से भी समझौता करना पड़ेगा। जबकि राफेल को बनाने वाली डसॉल्ट (Dassault) कंपनी के साथ यह बात हुई है कि वे इसकी सर्विसिंग को लेकर कोई समझौता नहीं करेंगे।

      एक मिग 29 विमान की कीमत लगभग 15 मिलियन डॉलर है, जबकि अमरीका के एफ 18 सुपर हॉरनेट (F 18 Super Hornet) की बात करें तो उसकी कीमत 66 मिलियन डॉलर है। इसी तरह से अन्य विमानों की कीमतें भी हैं जोकि आसमान छूने वाली हैं। लेकिन सवाल अब यह है कि यदि हमें अपने पायलटों की सुरक्षा, विमानों की लंबा कार्यकाल, अच्छी व भरोसेमंद लड़ाकू क्षमता और समयबद्ध सर्विसिंग चाहिए तो हमें मिग विमानों का मोह त्यागना होगा। नहीं तो आगे भी देश के जांबाज पायलट यूंही मौत के मुंह में जाते रहेंगे और देश की सुरक्षा पर भी प्रशनचिन्ह लगता रहेगा।

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