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क्या नीतिश कुमार कोरोना का डर छिपा रहे हैं ?

      कोरोना काल में जहां एक ओर दुनिया भर के बड़े से बड़ा नेता अपनी जनता को लगातार संबोधित कर रहे हैं, वहीं बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतिश कुमार शायद अकेला ऐसे नेता हैं, जो मार्च से लेकर मई तक तीन माह अपने घर से ही बाहर नहीं निकले । यह ऐसा समय था, जब लोगों को अपने नेता की सख्त से सख्त जरूरत थी, क्योंकि यह शताब्दियों में एक बार आने वाला कोरोना काल है और आम जनता को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इस बारे कुछ नहीं पता था । साथ ही उन्हें अपने नेता से सांत्वना और ढांढस बंधाने की बेहद सख्त जरूरत भी थी, लेकिन सुशासन बाबू  शायद इसे समझने में असमर्थ रहे ।

      गुरुवार, 25 जून की रात को अचानक हुए वज्रपात से बिहार में अब तक 88 से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है । राज्य सरकार ने मृतकों के परिवारों को 4 – 4 लाख अनुग्रह अनुदान देने की घोषणा की है । ऐसे समय में देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का शोक संदेश भी आ जाता है, लेकिन प्रदेश के मुख्यमंत्री फिर से विज्ञप्ति (Press release) के सहारे ही लोगों से संवाद करते हैं । इससे पहले भी गलवान घाटी में शहीद सैनिकों के पार्थिव शरीर को श्रंधांजलि तो उन्होंने दी, किंतु यहां पर भी वे शहीदों के परिवारों व मीडिया से नज़रें चुराते ही दिखे ।

      वज्रपात में तो हद तब हो गई, जब केवल विपक्ष के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव का ही वीडियो संदेश लोगों के बीच आया । न तो मुख्यमंत्री और न ही उप – मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मीडिया के जरिये लोगों से बात करना ठीक समझा ।

      ऐसा नहीं है कि नीतिश कुमार शुरू से ही ऐसे स्वभाव के हैं, जो अधिक संवाद पसंद नहीं करते । प्रदेश के पिछले चुनावों में प्रधानमंत्री ने स्वयं उनके बारे में अपनी मीडिया से बातचीत में कहा था कि शख्स शाम के समय कई घंटों तक प्रवचन देते हैं ।

      नवंबर में बिहार में चुनाव होने हैं । ऐसे में क्या नीतिश कुमार इसी तरह लोगों से स्वयं को लोगों से छिपाते रहेंगे या फिर वे रैलियों के लिए बाहर भी आएंगे ? या फिर ऐसी आशंका भी जताई जा रही है कि वे कोरोना के डर से लोगों के बीच आने से बच रहे हैं । तीन महीनों तक घर से बाहर न निकलना इसी बात की ओर इशारा कर रहा है । वे बस अपने अफसरों के बीच ही घिरे रहते हैं और उनके सहारे ही अपने कामकाज को चलाते हैं ।

      बिहार में जिस तेजी से कोरोना के केस बढ़े हैं, उसने उनके प्रशासन पर भी सवाल खड़े किए हैं । कोरोना केसों का मामला जल्दी ही दस हजार को पार करता हुआ दिख रहा है । ऐसे में उनके सुशासन के साथ – साथ लोगों को यह भी चाहिए था कि उनका नेता उनके साथ खड़ा दिखे । और एक मजबूत नेता की छवि भी इसी तरह बनती है । राजनीति के समीकरण भी इसी ओर इशारा करते हैं कि जनता के साथ संवाद आज के दौर में बहुत ही आवश्यक है । नवंबर में ही अमरीका के राष्ट्रपति पद के चुनाव होने हैं और ट्रंप एक लाख लोगों की मृत्यु के बाद भी मजबूती से खड़े हैं । ऐसा इसीलिए हो पाया है क्योंकि उन्होंने अपने लोगों से लगातार संवाद रखा है और डर के माहौल को काटने की लगातार कोशिश की है ।

      यदि भारत की बात करें तो हर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी अपने – अपने प्रदेशों की जनता से बात करते नजर आएंगे । दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो लगभग हर रोज़ ही एक वीडियो संदेश जारी कर रहे हैं । हालांकि दिल्ली की भयावह स्थिति ने यह दिखा दिया है कि केवल संवाद ही जरूरी नहीं होता, यदि वे इतना समय दिल्ली की दशा सुधारने में लगाते तो शायद आज दिल्ली के आंकड़े कुछ अलग होते ।

      ऐसा न हो कि विपक्ष उनके इस अचानक हुए परिवर्तन का फायदा उठा कर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल रहे, क्योंकि यह भूलने वाली बात नहीं है कि पिछले विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद के जेल में होने के बावजूद भी उनकी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी । वे अब भी ऐसा करने में सक्षम हो सकते हैं, क्योंकि चुनावों के अंतिम दिनों में चुनावी रुझान बहुत ही तेजी से लोगों के बीच बदलते रहते हैं । सुशासन बाबू ने स्वयं प्रशांत किशोर के सहारे पिछली बार ऐसा किया है ।

      फिर भी आने वाले चुनावी मौसम को बिहार और उसके मुख्यमंत्री किस तरह संभालेंगे, यह देखने योग्य बात होगी । बीजेपी से उनको पूरा बहुत मिलता ही रहेगा, लेकिन वे अचानक आए अपने व्यवहार से कब निजात पाएंगे, क्योंकि ऐसी परिस्थिति उन्हें रहस्मयी स्थिति में डालती है । कोई भी नेता कोरोना जैसी अति असामान्य परिस्थिति और चुनावी सरगर्मियों में स्वयं को कमरों में बंद करने के बजाए लोगों के बीच ही रखना पसंद करता है ।

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