Top Listings

Top controversial politicians in India

दिगविजय सिंह

दिगविजय सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से राज्यसभा में सांसद हैं । वे मध्यप्रदेश के दो बार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं । उनके नाम कई विवादों से जुड़े हैं और कांग्रेस के सबसे पुराने व विवादित लोगों में से एक हैं । वर्ष 2011 में हुए बहुचर्चित बाटल हाउस एनकाउंटर में उन्होंने यह कह दिया था कि वह पुलिस द्वारा किया गया एनकाउंटर फेक हैं, जिसके बाद उन्हीं की पार्टी ने उनके इस ब्यान को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था । वर्ष 2011 में ही दिगविजय सिंह ने यह भी कहा था कि ओसामा बिना लादेन को मारने के बाद अमरीका को उसे मारने की बजाए दफनाना चाहिए था । चाहे कोई आतंकी ही क्यों न हो, मरने के बाद उसकी क्रिया उसके धर्म के अनुसार ही होनी चाहिए । इसके अलावा वर्ष 2013 में अपनी ही पार्टी की महिला कार्यकर्ता पर भी अभद्र टिप्पणी करने का विवाद भी सार्वजनिक हुआ था । वर्ष 2008 में हुए मुंबई 26/11 हमले का आरोप उन्होंने राष्ट्रीय सेवा संघ पर लगाया था और इसे लेकर उन्होंने एक किताब अनावरण भी किया था । वे आंतकवादी लादेन के लिए “जी” जैसे सम्मानजनक शब्द का भी प्रयोग कर चुके हैं । वर्तमान में भारत में भगोड़े घोषित इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाईक के बहुत बड़े प्रशंसक हैं और उन्हें शांति का दूत भी कह चुके हैं ।

Dr. Subramanian Swamy

विवादों की बात की जाए और सुब्रमण्यम स्वामी के नाम का जिक्र न हो, ऐसा नहीं हो सकता है । कट्टर हिंदुत्व का समर्थन करने वाले स्वामी वर्ष 2016 से राज्य सभा के नामंकित सांसद हैं । वैसे तो उनका लगभग हर ब्यान ही विवादित होता है, किंतु कुछ बड़े विवाद जो उनके नाम के साथ जुड़े हैं उनमें सबसे प्रमुख है सोनिया गाँधी व राहुल गाँधी पर लगातार आरोप लगाना । दोनों की डिग्रियों पर आपत्ति जताना, दोनों की राष्ट्रवादिता को चुनौती देना, दोनों के पास इटली की नागरिकता का होना आदि आरोप लगाने का मौका वे किसी भी सभा में नहीं चूकते हैं । इसके अलावा नेश्नल हेराल्ड में जालसाजी का केस भी उन्होंने दोनों के ऊपर किया है, जिसमें दोनों माँ – बेटे कोर्ट से जमानत पर बाहर हैं । इसके अलावा वे 2 जी स्पेक्टर्म घोटाले को भी जनता के सामने लाने प्रमुख लोगों में से थे, जिसने बाद में बहुत बड़ा तूल पकड़ा था और भारत में अब तक के सबसे बड़े घोटालों में से एक गिना जाता है । वे मोदी सरकार में दिवंगत अरुण जेटली जी के वित्त मंत्री बनाए जाने से भी नाखुश थे और खुलकर उनका विरोध करते थे । इसके अलावा वे समलैंगिक अधिकारों के भी विरोध में थे । उनका मानना था कि समलैंगिक अधिकार देने से एचआईवी केसों में बढ़ोतरी होगी । स्वामी से कांग्रेस सांसद शशिथरूर पर उनकी पत्नी सुनंदा पुष्कर की हत्या का भी आरोप लगाया था । अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर उन्होंने कहा था कि उन्होंने आत्महत्या नहीं कि बल्कि उनकी हत्या हुई है और अगर जरूरत पड़ी तो वे स्वयं उनके केस को लड़ेंगे ।

8. नवजोत सिंह सिद्धू

कांग्रेस पार्टी के नेता नवजोत सिंह सिद्धू चाहे क्रिकेट में हों या राजनीति में, वे दोनों में धुंआधार बल्लेबाजी करते हैं । उन्हें रुक कर खेलना पसंद नहीं है । इसीलिए जब वे कई वर्षों तक बीजेपी की ओर से सांसद चुने जाते रहे तो भी वे अपनी बात बड़ी ही बेबाकी से रखना पसंद करते थे । उन्होंने पंजाब राज्य में बीजेपी के प्रमुख सहयोगी पार्टी शिरोमणी अकाली दल के विरूद्ध हमेशा ही मोर्चा खोल कर रखा । वे अकाली दल, खासकर बादल परिवार पर पक्षपात व भ्रष्टाचार के आरोप लगाते रहे । इसके अलावा कांग्रेस के विरुद्ध भी वे लगातार हमलावर रहे । एक अच्छे वक्ता के तौर पर वे सभी को प्रभावित करके रखते हैं । कुछ वर्षों बाद जब वे बीजेपी छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए तो उनके कई प्रशंसक भी उनसे काफी नाराज हुए थे । उसके कुछ समय बाद ही वे अमृतसर पूर्व से विधायक बन कर पंजाब सरकार में पर्यटन मंत्री बने, किंतु यहां भी उनके राजनैतिक समीकरण सही नहीं बैठे और मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के साथ उनकी खटपट की खबरें आने लगी । शीघ्र ही उन्हें मंत्री पद गंवाना पड़ा । इसी बीच उनका इमरान खान के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण समारोह में जाना बेहद ही विवादास्पद रहा । मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह द्वारा यह बयान दिया गया कि सिद्धू को वहां जाने के लिए मना किया गया था, किंतु वे नहीं माने । साथ ही वे पाकिस्तान जाकर जनरल कमर जावेद बाजवा के भी गले लगे, जिसकी देशभर में नाराजगी जाहिर की गई । इसी के कुछ समय बाद पाकिस्तान स्थित खालिस्तानी आतंकवादी गोपाल सिंह चावला के साथ मिलना और फोटो खिंचवाना भी उनके लिए भारी पड़ा । चावला के हाफिज सईद से नजदीकी रिश्ते माने जाते रहे हैं । इसके कुछ ही हफ्तों बाद उन्होंने पुलवामा हमले में पाकिस्तान को दोषी करार देने पर सवाल भी उठाए । जिसका बाद पूरे देश में विवाद इतना बढ़ गया कि उन्हें कपिल शर्मा शो से भी हटा दिया गया ।

7. स्मृति ईरानी

बीजेपी सांसद स्मृति ईरानी न चाहते हुए भी विवादों में घिरी रहती हैं । 2014 में मोदी सरकार में मानव संसाधन विकास मंत्री बनने के बाद वे अपने डिग्री विवाद में घिर गई थी । यह विवाद इतना बढ़ गया कि मामला कोर्ट तक जा पहुँचा । हालांकि बाद में उन्हें कोर्ट द्वारा राहत प्रदान कर दी गई थी । इसके अलावा 2016 के जेएनयू विवाद में भी उनके नाम आया था । इसके अलावा रोहित वेमुला की आत्महत्या केस में भी उनके द्वारा दिए गए भाषणों से विवाद गरमा गया था । वे कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पर भी लगातार टिप्पणी करती रही थी और तीखे तेवरों के कारण प्रशंसकों व विरोधियों दोनों की ही खास बनी हुई थीं । इनके अलावा भी कई अन्य छोटे – बड़े विवादों व् ट्वीट वॉर के चलते उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाकर कपड़ा मंत्रालय दे दिया गया था । फिलहाल वे संसदीय क्षेत्र अमेठी से सांसद हैं और 2019 के लोक सभी चुनावों में राहुल गाँधी को हराकर एक नया कीर्तीमान रचा था, क्योंकि यह क्षेत्र शुरू से ही कांग्रेस पार्टी के प्रभुत्व वाला क्षेत्र माना जाता था । मोदी 2.0 में वे कपड़ा मंत्रालय के साथ – साथ महिला एवं बाल विकास कल्याण मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार देख रही हैं ।

6. अमित शाह

मोदी कैबिनेट 2019 के गृह मंत्री अमित शाह प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के सबसे पुराने और सबसे खास सहयोगी रहे हैं । 2019 में गृह मंत्री बनते ही शाह ने अगस्त माह में संवैधानिक तरीके से जम्मू – कश्मीर को दो भागों में बांट कर लद्दाख को केंद्रीय शासित प्रदेश बना दिया । साथ ही धारा 370 को भी संविधान से हटा दिया गया । इसके बाद से देश ही नहीं विदेशों में भी विवाद की लहर दौड़ पड़ी और सभी अपने – अपने मतों को लेकर सरकार के पक्ष या विरोध में उतर आए । अभी कश्मीर मसला शांत भी नहीं हुआ था, तो दिसंबर में शाह ने दोनों सदनों से नागरिकता कानून बिल को भी पास करवा दिया । इसके बाद से देशभर में एक विरोध की लहर आ गई और कई जगहों पर हिंसक झड़पे भी होने लगी । लेकिन शीघ्र ही उन्हें संभाल लिया गया, किंतु शाहीन बाग का प्रदर्शन कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन के बाद ही बंद हो पाया । गृह मंत्री बनने से पहले भी शाह बीजेपी के प्रमुख नेता थे और बीजेपी के अध्यक्ष रह कर पार्टी को कई चुनाव जितवाए । और जो नहीं जितवा पाए, उन प्रदेशों में से अधिकतर में बाद में बीजेपी की सरकार बन गई, जिसकी सारी पटकथा लिखने का श्रेय शाह को ही दिया जाता है । इनपर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि ये विरोधी खेमे के नेताओं को खरीद कर अपनी पार्टी में शामिल करते रहे हैं, जिससे प्रदेशों की राजनैतिक शांति भंग होती रही है । यदि लॉकडाउन न होता तो यह देखना दिलचस्प रहता कि अब वे बीजेपी के वायदों के अनुसार बाकि के बिलों को किस तरह दोनों सदनों में पास करवा पाती है, जबकि उनके विरोध में कई जगह पर विपक्ष कमर कस कर बैठ चुकी है । इसका सबसे बेहतरीन उदाहरण है महाराष्ट्र के चुनाव । वहां के चुनावों में विपक्ष ने इन्हीं की चाल को इनके ही विरुद्ध इस्तेमाल किया और शिवसेना की सहायता से बीजेपी को बाहर का रास्ता दिखा दिया, जिसके बाद शाह की भी बहुत किरकिरी हुई ।

5. ममता बनर्जी

पश्चिम बंगाल की राजनीति ममता बनर्जी के बिना अधूरी है । उन्होंने राष्ट्रीय भारतीय कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस को बड़ी ही मेहनत से बनाया है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इनके तेज तर्रार रवैये की तारीफ कई मंचों पर कर चुके हैं । इसी रवैये ने इन्हें कई विवादों में भी हमेशा ही घेरकर रखा है, लेकिन ‘दीदी’ किसी भी विवाद से कभी विचलित होती हुई नहीं दिखी हैं । इनके नेतृत्व में कई पार्टियों के नेता एक साथ मंच पर 2019 के चुनावों के लिए बीजेपी के विरुद्ध खड़े हुए थे, किंतु उसका कोई खास असर नहीं दिख पाया और बीजेपी बहुत बड़ी संख्या में चुनाव जीत कर फिर से केंद्र में आई थी । फिलहाल कुछ सालों से इनका मुकाबला सीधा बीजेपी से ही हो रहा है, क्योंकि कांग्रेस और सीपीआई जनता के बीच कुछ खास असर दिखाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं । इसी कड़ी में इनपर हिंदु आस्थाओं के प्रति भेदभाव करने का आरोप लगातार लगता आया है, जिसमें अक्तूबर, 2016 में मुहर्र्म होने के कारण दुर्गा मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाकर का मामला सबसे प्रमुख था । इसी पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी इसे भेदभाव करने वाला निर्णय बताकर इसे पलट दिया था । साथ ही नारदा स्कैम और बाद में उस केस के सिलसिले में पुलिस से पूछताछ करने आई सीबीआई की टीम को ही गिरफ्तार करने के मामले ने भी बहुत बड़ा तूल पकड़ लिया था । हालिया कुछ महीनों से बंगाल में राष्ट्रीय सेवा संघ व बीजेपी कार्यरताओं के हो रहे मौतों के कारण भी ममता बनर्जी व उनकी सरकार पर गंभीर आरोप लग रहे हैं ।

4. अरविंद केजरीवाल

दिल्ली वालों के चहेते मुख्यमंत्री और मफलरमैन के नाम से पहचाने जाने वाले अरविंद केजरीवाल शुरुवात से ही विवादों के कारण सुर्खियों में रहे हैं । कभी अन्ना हजारे के साथ समाज सेवी के तौर पर राजनीति को साफ करने की कसम खाने वाले केजरीवाल आज स्वयं उसी राजनीति के बड़े खिलाड़ी बन चुके हैं । इनके विवादों की लिस्ट बहुत लंबी है, लेकिन एक मजबूत राजनैतिक छवि के लिए बड़े विवाद भी नाम के साथ होने ही चाहिए, ये बात इन्हें बहुत जल्दी समझ आ गई थी । शायद इसीलिए वे तीन बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बनने में सक्षम हो पाए हैं । कभी राजनीति में न आने के लिए कसमें खाना, मंहगी गाड़ी, बड़े घर, हाई प्रोफाईल सुरक्षा न लेने आदि की कसमें खाने वाले केजरीवाल आज इन बातों को भूल कर परंपरागत राजनेता की भूमिका अदा कर रहे हैं । साथ ही पाकिस्तान में जाकर सर्जिकल स्ट्राईक पर सेना से सबूत माँगना, बुलेट ट्रेन का विरोध करना, जेएनयू में देश विरोधी नारे लगाने वालों के साथ खड़े दिखाई देना आदि जैसे वैचारिक मतभेदों के कारण अपनी पार्टी में कुमार विश्वास जैसे कद्दावर नेताओं से इनका झगड़ा रहा है । 2019 में लागू हुए नागरिकता कानून का भी इनकी आम आदमी पार्टी ने खुलकर विरोध किया था और शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों को समर्थन भी दिया था । इसके अलावा दिल्ली में बिजली, पानी व बस सेवा जैसी विवादित किंतु सफल रणनीति से इन्होंने 2020 के दिल्ली चुनाव में भारी मतों से जीत हासिल की थी । हालिया दिनों में भी दिल्ली में बड़े स्तर पर फैले कोरोना वायरस से इनकी कार्यक्षमता पर भारी सवाल उठे हैं ।

3. राहुल गाँधी

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी का यूं तो विवादों में रहना कोई बड़ी बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि कांग्रेस भारत की सबसे पुरानी पार्टी है और संसद में भी विपक्ष की भूमिका में है । लेकिन राहुल गाँधी का इस लिस्ट में होने का कारण है उनके कई दिए गए कई भाषण और टिप्पणियाँ । इसके अलावा उनकी नेतृत्व क्षमता पर भी समय – समय पर बड़े सवाल उठते रहे हैं । इसमें कोई शक नहीं कि उनके दिए गए कई भाषण तो इंटरनेट पर गलत तरीके से दिखा कर पेश किए जाते हैं, ताकि वे हास्तपद लगें । हर बड़े नेता के शब्दों को इंटरनेट पर तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है, ताकि उनके विरोध में भ्रम फैलाया जा सके । किंतु राहुल गाँधी स्वयं भी कई बार यह साबित कर चुके हैं कि राजनीति में इतने वर्षों के बाद भी उनमें परिपक्वता की कमी अब भी है । राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर उन्होंने सरकार का पुरज़ोर विरोध किया था और देश में इसे एक बड़ा मुद्दा बनाने में भी वे सफल रहे थे, हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उनके उठाए विवाद को पूरी तरह नकार दिया था । जिसके बाद उनके नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्यप्रदेश के चुनाव में जीत हासिल की थी । हालांकि मध्यप्रदेश में अब बीजेपी की सरकार है और राजस्थान में भी अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच उठे उफान से कांग्रेस सरकार को खतरा पैदा हो गया है । इस तरह के मतभेदों के कारण भी राहुल गाँधी के नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठते रहे हैं । साथ ही 2019 के लोक सभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी तरह हुई हार भी इन्ही के सिर आई थी । हाल फिलहाल में भी वे सरकार के उन दावों को लगातार चुनौती देते दिख रहे थे, जो सरकार चीन के विरुद्ध लद्दाख सीमा पर कर रही थी ।

2. योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वर्ष 2017 में अपना कार्यभार संभाला, लेकिन राजनीति के इतने बड़े मंच पर आकर भी उनके विचारों व कार्य करने की शैली में कोई बदलाव नहीं आया है । वे कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा रखते हैं और उनके रहन – सहन व बातों से यह साफ झलकता है, शायद इसीलिए उन्हें बीजेपी हाई कमान द्वारा मुख्यमंत्री के रूप में भी चुना गया है । इससे पहले वे गोरखपुर से पाँच बार सांसद भी रह चुके हैं । एक बात जिससे उनके समर्थक व विरोधी दोनों ही सहमत है, वह यह कि वे किसी भी परिस्थिति या वर्ग के लिए अपने विचारों को बदलते नहीं हैं, फिर वह चाहे कितने ही कठोर क्यों न लगें । मुख्यमंत्री बनने के बाद से उनका पूरा ज़ोर उत्तर प्रदेश में गुंडा गर्दी मिटाने पर है, जिसके तहत अपराधियों की धड़ – पकड़ में कई एनकाउंटर भी हुए हैं । इसका ताज़ा उदाहरण विकास दूबे का एनकाउंटर है, जो बहुत अधिक विवादों में रहा था । इससे पहले उत्तर प्रदेश में सीएए का विरोध करने व सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने वाले कई लोगों के पोस्टर पूरे प्रदेश में लगवा दिए थे । जिसके बाद उन्हीं से उन नुकसानों की भरपाई भी की गई है । इसी तरह के विवाद समय – समय पर उनके कार्यकाल व उससे पहले भी उठते ही रहे हैं ।

1. असदुद्दीन ओवैसी

राजनेताओं और विवादों का साथ चोली – दामन सा होता है । कोई राजनेता जितना अधिक विवादित है, उतना ही अधिक लोगों में लोकप्रिय भी हो जाता है । हालांकि कई नेता अपने काम के दम पर लोगों के बीच छवि बनाते हैं, लेकिन बहुत से ऐसे भी हैं, जोकि जनता में केवल अपने विवादों के कारण लोकप्रिय हैं । इसमें सबसे ऊपर नाम आता है असदुद्दीन ओवैसी का । यूं तो ओवेसी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन के अध्यक्ष हैं, और इनकी पार्टी के कई क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तरों पर भी चुनाव लड़ती आई है, किंतु वे अभी तक अपनी पार्टी को कुछ खास सफलता दिलवा नहीं पाए हैं । अब तक उनकी पार्टी ने लोकसभा में कुल 2 सीटें ही अर्जित की हैं, और राज्य सभा में तो पार्टी का कोई खाता नहीं है । इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि क्यों ओवेसी इतना अधिक विवादों में रहते हैं । दरअसल विवादों में रहना एक कारगर तरीका होता है जनता की नज़रों में स्वयं को रखने का । जनता बहुत अधिक देर तक नेताओं के विवाद याद नहीं रखती है और ओवेसी इसे अच्छ से जानते हैं । साथ ही वे बहुत अच्छे वक्ता भी हैं और पेशे से वे वकील भी हैं । उनके विवादों में जो एक चीज़ सामान्य होती है, वह है धर्म । कहीं न कहीं उनके मुद्दे धर्म से जुड़े होते हैं, जिससे पता चलता है कि वे मुस्लिम समाज का वोट हासिल करने की जुगत में लगे रहते हैं । राम मंदिर के हर निर्णय से लेकर, सीएए जैसे ही मुद्दों में भी वे पुरजोर तरीके से सरकार के विरोध में रहे हैं ।

Added for comparison

×

Error

Maximum of Three products are allowed for comparision