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Top demands of farmers

1. तीनों नए कृषि कानून वापस लिए जाएं।

      दिसंबर, 2020 में पंजाब, हरियाणा व खासकर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे किसानों की सबसे बड़ी मांग है कि तीनों कृषि संबंधित बिल सरकार तुरंत प्रभाव से वापस लें। तीनों कानूनों के नाम इस प्रकार हैं- कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) कानून 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून 2020, आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून -2020. किसानों की इस मांग का पूरा होना बहुत मुश्किल दिख रहा है। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने किसानों को आश्वासन दिया है कि एमएसपी और मंडी संरचना जारी रहेगी, लेकिन ऐसा लगता है कि किसानों को सरकार पर भरोसा नहीं है। उनका मानना है कि यदि कृषि क्षेत्र को सबके लिए खोल दिया जाएगा तो तीनों कृषि बिलों से कॉर्पोरेट जगत को ही फायदा होगा, जबकि किसानों की दुर्दशा होगी ।

      प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अपने बिलों को लेकर काफी गंभीर रहती है और किसी भी प्रकार से उनमें छेड़छाड़ करती नज़र न के बराबर ही आती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण हमनें तब देखा था जब गृह मंत्री अमित शाह की अगुवाई में नागरिकता कानून लाया गया और पूरे देश भर में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी कई जगह इसका विरोध देखा गया। इसी तरह जब जम्मू कश्मीर और लद्दाख से धारा 370 हटाने व उन्हें अलग करने तथा केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने के बिल पारित हुए भी विरोध की लहर अवश्य आई, किंतु सरकार की मंशा के आगे विपक्ष व विरोधियों को नतमस्तक होना ही पड़ा। इस बार भी सरकार प्रदर्शनकारी किसानों से बातचीत करने में लगी हुई है, किंतु हाल – फिलहाल में तो इसका कोई हल निकलता नज़र नहीं आ रहा है।

2. MSP को कानूनी सुरक्षा का जामा पहनाया जाए।

      प्रदर्शनकारी किसान तीन कृषि बिलों से इसलिए भी परेशान हैं क्योंकि उनमें से किसी ने भी एमएसपी (MSP) के बारे में कुछ नहीं बताया है। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने मौखिक रूप से किसानों से वादा किया था कि एमएसपी प्रणाली रहेगी, किंतु किसानों को सरकार पर भरोसा करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि, सरकार का कहना है कि उन्होंने जो तीन कृषि बिल पेश किए हैं, उनका एमएसपी से कोई लेना-देना नहीं है।

      किसानों का कहना यह भी है कि एमएसपी को सुरक्षित रखने वाला कोई कानून सरकार के पक्ष में काम नहीं करता है। जबकि किसानों को निजी कंपनियों सहित किसी भी इकाई को अपनी फसल बेचने की अनुमति दी गई है, उन्होंने सरकार से एमएसपी पर एक लिखित वादा करने की मांग की है क्योंकि उन्हें डर है कि कॉर्पोरेट न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनुपस्थिति में उनका शोषण करना शुरू कर देंगे। बहुसंख्यक भारतीय किसानों को वास्तव में एमएसपी संरचना से कोई लाभ नहीं हुआ है। कृषि उपज की खरीद के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य शुद्ध बढ़ाने में यूपीए और एनडीए सरकार असफल ही रही हैं।

      पिछले दशक के एमएसपी आंकड़ों से पता चलता है कि सभी फसलों - खरीफ और रबी के लिए एमएसपी में औसतन गिरावट आई है। चूंकि किसान एमएसपी पर कानूनों की कमी के कारण पहले से ही दशकों से पीड़ित हैं, वे चाहते हैं कि सरकार एमएसपी की गारंटी दे, जब वे निजी व्यापारियों के साथ व्यापार करेंगे।

3. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू हो।

      किसानों की तीसरी मांग काफी हद तक सही लगती है, जिसमें उन्होंने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को लागू करने की मांग की है। कहा जाता है कि अगर इस रिपोर्ट को लागू कर दिया जाए तो किसानों की तकदीर बदल जाएगी. अनाज की आपूर्ति को भरोसेमंद बनाने और किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के मकसद से 18 नवंबर 2004 को केंद्र सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था। इस रिपोर्ट में भूमि सुधार की अनुशंसा की गई थी।

      इसमें भूमि सुधारों को बढ़ाने पर जोर दिया गया. अतिरिक्त और बेकार जमीन को भूमिहीनों में बांटना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने का हक देना आदि है। आत्महत्या रोकने की कोशिश भी इस रिपोर्ट का अहम हिस्सा थी। आयोग की सिफारिशों में किसान आत्महत्या की समस्या के समाधान, राज्य स्तरीय किसान कमीशन बनाने, सेहत सुविधाएं बढ़ाने और वित्त-बीमा की स्थिति पुख्ता बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है यदि इसे लागू किया जाए तो किसानों की स्थिति में काफी सुधार की संभावना है।

      रिपोर्ट की अन्य मुख्य बातों थी फसल उत्पादन मूल्य से पचास प्रतिशत ज़्यादा दाम किसानों को मिले, किसानों को अच्छी क्वालिटी के बीज कम दामों में मुहैया कराए जाएं, गांवों में किसानों की मदद के लिए विलेज नॉलेज सेंटर या ज्ञान चौपाल बनाया जाए, महिला किसानों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएं और किसानों के लिए कृषि जोखिम फंड बनाया जाए, ताकि प्राकृतिक आपदाओं के आने पर किसानों को मदद मिल सके।

4. प्रदूषण के कारण किसानों को सजा का प्रावधान खत्म हो।

      कृषि विभाग के अधिकारियों के मुताबिक फसल अवशेष को जलाने से वायु प्रदूषण होता है। जिसके कारण वायु प्रदूषण निवारण और नियंत्रण अधिनियम के तहत 2 एकड़ से कम के लिए 2500 रुपए प्रति घटना, 2 से 5 एकड़ तक 5 हजार रुपए प्रति घटना और 5 एकड़ से अधिक होने पर 15 हजार प्रति घटना अर्थदण्ड व 6 माह की सजा का प्रावधान हैं। किसानों की मांग है कि सजा का यह प्रावधान खत्म हो ताकि किसान अपनी खेती को स्वतंत्रता से कर सके।

      ऐसा हो सकता है कि सरकार इस मांग पर गौर करे और किसानों को सशर्त कुछ हद तक इसमें राहत प्रदान करे। किंतु देशभर में, खासकर दिल्ली में बढ़ते अनियंत्रित प्रदूषण के कारण ऐसा होने की संभावना भी कम ही है। जब भी दिल्ली में प्रदूषण की बात आती है तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बार – बार हरियाणा व पंजाब में भारी मात्रा में पराली जलाने के कारण वहाँ का प्रदूषण दिल्ली को प्रदूषित कर रहा है।

5. डीज़ल की कीमतों में 50% की कमी हो।

      किसानों की अगली मांग है कि डीजल की कीमतों में 50% तक की कमी हो। खेती करने से लेकर उसे बेचने तक कई तरह की मशीनों को काम में लाया जाता है, जिसमें ट्रैक्टर प्रमुख है। इससे किसानों को खेती करने में हो रहे भारी खर्चों में काफी कमी देखने को मिलेगी और अंतत: किसानों के लिए यह फायदे का ही सौदा होगा।

      लेकिन इसमें भी सरकार के लिए पेंच है। एक तरफ सरकार चाहती है कि वर्ष 2030 तक भारत पूरी तरह अक्षय ऊर्जा पर निर्भर हो जाए, इसीलिए तेल की कीमतें भी अब कम होने वाली नहीं दिख रही हैं। दूसरी ओर डीज़ल प्रदूषण का मुख्य स्त्रोत है और प्रदूषण को लेकर भी भारत ने पेरिस समिट में कई वायदे किए हैं। साथ ही केवल किसानों को सस्ता डीज़ल मुहैह्या हो, ऐसा होना भी मुश्किल है क्योंकि इससे डीज़ल की कालाबाज़ारी होने का खतरा बहुत अधिक है।

6. सभी बुद्धिजीवियों व मानवधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई।

      किसानों के कृषि बिल संबंधित आंदोलन ने अचानक ही एक नया मोड़ तब लिया, जब किसानों की मांग में सभी बुद्धिजीवियों व मानवधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग भी जुड़ने लगी। यह एक बेहद अजीब मांग है, जिसका दूर – दूर तक किसानों या कृषि बिल से कोई लेना देना नहीं है। हालांकि किसान यूनियनों का कहना है कि उनकी यह मांग आंदोलन के शुरू से ही थी। जो प्रमुख नाम उनकी इस लिस्ट में शामिल हैं, वे इस प्रकार हैं:- वारावारा राव, सुधा भारद्वाज, गौतम नवलख, उमर खालिद आदि।

      हालांकि इस मांग को रखने वाले यह मानते हैं कि ये सभी लोग बुद्धिजीवी हैं और किसानों के विभिन्न कामों में सहायता करेंगे। चूंकि यह मांग बिलकुल ही गलत लगती है और किसानों के आंदोलन या कृषि बिल से संबंधित नहीं दिखती, इसके पूरे होने की आशंका न के बराबर ही है। इस अंतिम मांग के कारण ही किसानों के आंदोलन को भारी चोट पहुँची है और लोगों में इस बात का भी संदेश जा रहा है कि यह किसानों से अधिक विभिन्न राजनीतिक पार्टियों का आंदोलन है, जो किसानों की आड़ में अपनी मांग रख रहा है।

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